Thursday, November 10, 2011

पलकों से उठा के ये ख्वाब 
सजाये है कदमो मैं तेरे 
संभल के रखना कदम अपने 
कही कुचल न जाये ख्वाब ये मेरे 


Wednesday, October 19, 2011

Conditional love

Conditional love

The perception of conditional love and unconditional application and experience for humanity is a major cause of segregation, alienation and slights that exist between people and peoples.
Although most people do not think about the subject, it is an undeniable reality and easily verifiable, it is distinct from the fact that the patriot who loves his country but dislike another country "enemy", the religion that values ​​the devotee who is faithful and unquestionably follow his teachings, but excommunicates or slander the followers of other faiths, the mother who caresses and supports their descendants, but can curse upon the children of others, the spouse who accepts the limitations of your partner, but criticizes or vilifies the same other features, the friend who closes his eyes to certain weaknesses of his friends, but eagerly disregard the same faults in others, a passion for a football team is also generating an intense dislike for all teams, among many other examples .
This partiality, or conditionality, is responsible for creating boundaries between countries, walls between religions, societies and groups from disparities between people.
However, it is an indisputable fact that although the majority of human beings living under the portents of this fact when they are asked about the possibility of changing this conditionality, almost all strongly people respond to the daily life would be more prosperous, enjoyable and harmonious if this happened in humanity.
Therefore, it is possible to infer, or aspire to, that one day humanity can live on a planet lasts a premises which symbolize the sky where there are no boundaries between the galaxies and even police asking passports to visit other stars. Where respect, veneration and admiration that every being is its own religion are widely extended to the devotees of other dogmas. Where understanding, tolerance and support for parents or spouses give each other are lovingly shared with strangers or people who live elsewhere. Where the admiration and affection that fans invest in their teams or athletes are the basis of perception to understand the behavior of fans of other teams, inter alia.
So when this happens, we will flourish by destroying policies that approximate boundaries, dogmas that educate the claim that all paths lead to one source, values ​​that harmonize when people learn to accept differences, and ultimately behaviors that bind upon awakening in the heart of each individual empathy that makes him, albeit in a limited, some of the other person who is before him.
So, that life is a path adorned by removing the constraints, the extent of tolerance and understanding and a sharing of endless love.

Thursday, August 18, 2011

के तुज से मैं बहोत प्यार करती हु ......

यु ना बुरा मान अगर 
" तुज को मैं  प्यार करती हु "

ये तोह बता गुनाह कोन सा ऐसा 
" मैं यार करती हु "

मेरी खताओं मैं
मेरी समज का
" नहीं कोई दखल "

मैं जो भी करती हु
"बे - इख्तियार करती हु"

तू कितने प्यार के काबिल है 
" क्या खबर मुज को "

के मैं तो जितना भी मुमकिन हो 
" सिर्फ तुजे ही प्यार करती हु "

खुदा की दुनिया से इतनी 
"महोब्बत नहीं है शायद "

खुदा के एक बंदे को मैं
"बे इंतहा प्यार करती हु "

Wednesday, August 17, 2011

क्योंकि तुम मेरे पास जो हो .....


उस ने  कहा कुछ बातें कर ले....
मैंने कहा
                   - क्यों आज इजाजत ले रहे हो 
उस ने  कहा.....
                  -अच्छा अगर जो मैं ना होता तो क्या होता ?
मैंने कहा.......
                  -तो मैं भी ना होती ।
उस ने पूछा ...
                  -वो क्यों ?
मैंने कहा.......
                  -क्योंकि जब तुम्हारा होना तय हुआ होगा तो मेरा होना भी तय हो गया होगा ।
वो मुस्कुरा कर बोला....
                   -तुम बातें बहुत बनाती हो ।
मैं  हसते हुए बोली ....
                   -जानती हूँ ।
वो चोंक का पूछ बैठा ...
                   -वो कैसे ?
मैंने शरमाते हुए  बोली..
                   -क्योंकि तुम मेरे पास जो हो ।

meri ek post per mere dost ne bahot hi acchi comment di thi....maine use toda sa edit kar ke yaha dubara post kiya hai.. muje wo comment itni acchi lagi ki maine yaha post karny ki gustakhi kar li....
thanks for ur comment pearl...

Palak ...

आज जब बारिश हुए
ये भी एक ख्याल आया
क्यों न एक बदल हो
जो मेरा राज़दार हो
जो कुछ गुज़रा है
सुने वो एक पल ठहर के
तुम से जो भी कहना है
सुने वो हस कर
फिर चले वो मुस्कुरा के
फिर बरसे वो
बेधड़क हो कर
आज ही तेरे दिल पर...

Friday, August 5, 2011

मुझे सिर्फ इंसान रहने दो ....!!

ना दो मुझे कोई पहचान 
मुझे सिर्फ इंसान रहने दो 
मज़हब की जरूरत होगी तुमको 
मुझे तो अब बेदाग़ रहने दो 

खुदा के बन्दों को अब 
ना कोई  नाम की जरुरत है 
हर शख्स को जीने के लिए 
अब तो सिर्फ सुकून की जरुरत है 

मजहब  को  मेरा  अब 
अपना  मामला  रहने  दो  
ना दो मुझे कोई पहचान 
मुझे सिर्फ इंसान रहने दो 

ख्वाब फिर सजा है आखों मैं 
धरती को जन्नत बन ने के 
न डालो फिर से ज़हर 
न घोलो रंग खुदगर्जी के 
इन्हे इस बार तुम बेरंग ही रहने दो 
मुझे सिर्फ इंसान रहने दो 

सरपरस्ती के शौखीन तुम से है गुज़ारिश 
कर सको तो इतना एहसान कर दो 
छोड़ दो अपने हाल पर लोगो  को 
इन्हे  ईमान पर  सिर्फ जिन्दा रहने दो 

न दो मुझे कोई पहचान 
मुझे सिर्फ इंसान रहने दो 

Thursday, August 4, 2011

ख्वाब तेरा होने का ....!!!!!

तेरे होठों की हसी बनने का ख्वाब है 
तेरे आगोश मैं  सिमट जाने का ख्वाब है 
तू लाख बचा ले दामन  इश्क के हाथो 
असमान बन कर तुजे पर छाने का ख्वाब है 
आज़माइश यु तो अच्छी नहीं होती इश्क की 
तू चाहे तो तेरी तकदीर सजाने का ख्वाब है 
वो मौत भी लौट जाये तेरे दरवाजे पे आ कर 
तुजे ऐसे जिन्दगी देने का ख्वाब है 
जी भी लगे अगर जीना पड़े तेरे बिना 
लेकिन एक बार तुज पर  मर मिटने का ख्वाब है 

Thursday, July 21, 2011

एक पुरानी किताब के पन्नों पे आज उंगली चलाई
जाने कहाँ से कुछ धीमी आवाज़ें आई

आवाज़ एक जानी पहचानी सी
आवाज़ें कुछ बरसों पुरानी सी

एक हँसी थी दूर से आती हुई
गूंजती थी दिल को भरमाती हुई

कितनी ही बातें थी उस आवाज़ में
जाने क्या कह गई अपने ही अंदाज़ में

एक संगीत खामोशी की नींद तोड़ता हुआ
पुरानी ग़ज़लों का दुशाला ओढ़ता हुआ

कुछ सवाल उठे उचक कर ऐसे
नींद से कोई बच्चा जागता हो जैसे

बूढ़ी पंखुड़ियों से बुझी राख टटोल रहा था
उस किताब में दबा एक गुलाब बोल रहा था

मेरा हाथ पकड़ कर वो मुस्कुराने लगा
किन्ही बिछ्ड़े रास्तों पर ले जाने लगा

कुछ सोच कर मैंने उसका हाथ झटक दिया
किताब बंद कर उसका मुंह भी बंद कर दिया

"शब्द संवेदन के खजाने से " 

Friday, July 8, 2011

तेरे जाने के बाद इतना सा गिला रहा हम को 
तू पलट कर देख लेता अगर 
तो जिन्दगी इंतज़ार मै गुजार लेते 

कभी  पूछ का देख अपनी यादो का आलम 
सारी सारी रात सितारों  से तेरा जिक्र करते है 

Tuesday, June 14, 2011

नामुमकिन सी आरजू .....

काश कहा होता

तुम्हे ख़ुशी चाहिए ,

हम दुनिया भर की दे देते,

काश तुम ने कहा होता,
ख्वाहिश पूरी करने को,

हम एक भी अरमान बाकि नहीं रखते,

कहा काश तुम ने कहा होता,
तारे तोड़ लेन को,

सारा आकाश ले आते,

काश तुम ने कहा होता,
प्यार करने को,

आखिरी सास तक करते,

काश तुम ने कहा होता ,
जान दे देने को,

हस्ते हस्ते दे देते,

पर तुम तो वोह मांग बैठे

जो मेरे बस में नहीं

नामुमकिन सी आरज़ू
तुम से जुदा होकर जीना …

Saturday, April 30, 2011

डर ..

नाम मेरा लेते हुए

अब वो डरता है
जो पल पल कहता था

मेरे पास कुछ नहीं है

तेरे नाम के सिवा ....

Thursday, April 14, 2011

ये संग्दिलों की दुनिया है,

ज़रा संभल के चलना ग़ालिब,

यहाँ पलकों पे बिठाया जाता है,

नज़रों से गिराने के लिए.....!!!

Monday, March 7, 2011

मै वो हु जिसे तुम प्यार किया करते थे...!!!!

मैं वोही हूँ जिसे तुम प्यार किया करते थे
दिन में सो बार मेरा नाम लिया करते थे
क्या बात है ...कियूं मुझ से खफ्फा बेठे हो
किया किसी और को दिल अपना दे बेठे हो
फासले तो पहले ना हुआ करते थे ऐसे
मैं वोह हूँ जिसपे तुम एतबार किया करते थे
मुझ को मालूम है ये गम है कोई सोगातनहीं
तुम्हे मै अब अपना कहू ऐसे भी हालात नहीं
और अगर भूल गए हो तो कोई बात नहीं
ज़ख़्म तो पहले भी इस दिल पे तुम लगाया करते थे
मैं वोही हूँ जिसे तुम प्यार किया करते थे
दिन में सो बार मेरा नाम लिया करते थे

Friday, March 4, 2011

जिन्दगी... !!!

एहसासों का कोई रूप नहीं होता..
जज्बातों की कोई शक्ल नहीं होती..
यूंही चलती जाती है जो बेमतलब सी..
वो ज़िन्दगी कोई ज़िन्दगी नहीं होती..
धुल भरी राहों पे चलके क़दमों ने है जाना..
हर एक राह की कोई मंजिल नहीं होती..
ना जाने कितनी सांसें बंद कमरों में हैं घुटती..
सांस लेना ही तो बस ज़िन्दगी नहीं होती..
मेरी आँखों से छलकता है कभी उनके दर्द का पानी..
जिनकी आँखों के रेतीले मरू में नमी नहीं होती..
धन्य है उनकी सहनशक्ति तो सही जाए हैं..
कभी किसी चोट पे उनके मुह से ‘उफ़‘ भी नहीं होती..
मेरे गुनाहों को गिनाने वालों थोडा सब्र करो..
नियति के घर देर है पर अंधेर नहीं होती..
जाने कैसी हैं ये ख्वाहिशें जीने की ,जीते जाने की..
आँखें सच देख के भी नहीं सोतीं..

कुछ शब्दों में समेट कर अपनी बातें..
समक्ष सबके रख देती हूँ..
शायद मेरे शब्दों में हैं उनकी भी बातें..
उनके शब्दों से समझ लेती हूँ..

ये ही तो होता है हर बार ,जब भी होती हैं बातें..
कभी तुम मेरी ,में तुम्हारी जगह होती हूँ..
फिर..एक दिन..
यूंही चलता ये मेल,टूट जाता है,रह जाती हैं यादें..
फिर यादों की बातों से तुमको याद कर लेती हूँ॥

यहाँ अपनी किताब के पन्नो मै
या यही शब्दों के ज़रिये
रख देती हु सब के सामने

आँखों में ....!!!!

दूर जाने का खौफ,

दर्द और नमी..
लब हैं खामोश


अनगिनत बातें..... हिदायतें..
तेरी आँखों में भी है,

मेरी आँखों में भी..

टूटकर चूर हुए ख़्वाबों की चुभती किरचें..
ज़िन्दगी भर के लिए ज़ख्म लिए रूह को है गुमान ...

प्यार के सब सुनहरे लम्हे,

सिसकते.. तडपते ....

तेरी आँखों में भी है,मेरी आँखों में भी..

आज हमेशा के लिए जुदा होने की कसम उठाने की मजबूरी..
तेरी आँखों में भी है, मेरी आँखों में भी..

Sunday, February 20, 2011

हसरत तुज़े पाने की .....!!!!

टूटे हुए खवाबों में हकीक़त ढूढती हु ,
पत्थर के दिलों में मोहब्बत ढूढती हु .
नादान हूँ में अब तक यह भी नहीं समझी ,
बेजान बातो में इबादत ढूढती हु .
मेरे जज्बातों की कीमत यहाँ कुछ भी नहीं ,
बेईमानी के बाजारों में शराफत ढूढती हूँ .
इस अजनबी दुनिया में कोई भी अपना नहीं ,
गैरों की आँखों में अपनी सूरत ढूढती हूँ .
उम्मीद की थी प्यार की बस येही भूल थी मेरी ,
गिरते हुए अश्कों में अपनी हसरत ढूढती हूँ

Thursday, February 10, 2011

अंजामे - ऐ - महोब्बत क्या होगा ..!!

मुझपर और इलज़ाम - ऐ - मोहब्बत क्या होगा
सुरूर भरा जाम - ऐ - मोहब्बत क्या होगा

हर ग़ज़ल में मैं लिखता हूँ तुझको
और मेरा पैगाम - ऐ - मोहब्बत क्या होगा

हर वक़्त तेरे सजदे में हूँ मैं पड़ा
इस से बड़ा सलाम - ऐ - मोहब्बत क्या होगा

इकरार तो कर लिया हमने मोहब्बत का
जाने अब अंजाम - - मोहब्बत क्या होगा

चल निकले संग तेरे हम नयी सुबह को
कौन जाने शाम - ऐ - मोहब्बत क्या होगा

यूह नज़र घडाए देख रहे यह दुनिया वाले
जाने अब अपना नाम-ऐ मोहब्बत क्या होगा

तय कर लिया हैं काटों का सफ़र, पर जाने
अब अगला इख्तेहाम-ऐ -मोहब्बत क्या होगा

लम्बा है यह सफ़र, टेडी- मेढ़ी है डगर
कौन जाने मुकाम- ऐ -मोहब्बत क्या होगा

Monday, January 17, 2011

क्या हो तुम...!!!!!

तुम क्या हो ?
मेरी मुस्कुराती शायरी के लव्ज़ हो तुम
ख्वाबों के मंज़र का खिलता गुलाब हो तुम
महक रही है फिजा भी छू कर
किसी चमन में आई वो बहार हो तुम.

अधूरी है मेरी हर नज़्म तुम्हारे बिना,
मेरी ग़ज़ल का वो आखिरी अल्फ़ाज़ हो तुम
जिंदगी क हर मोड़ पर जिसे पाने की हसरत हे,
वक़्त का वो खूबसूरत लम्हात हो तुम;
कितनी फीकी थी इन लबों की हसी तेरे बिना

मेरे लबों पर खिली वो मुस्कान हो तुम;
सींचा हे जिस से मेने इस वीरान चमन को,
मेरी आँखों से छलकता वो जाम हो तुम,
क्या नाम लेकर पुकारूं तुम्हे
मेरी थमती सांसों की आखिरी शाम हो तुम..

Sunday, January 9, 2011

तुम से है ...!!!!

ए मेरी ज़िन्दगी के हमसफ़र,
मेरी धडकनों में रवानी तुम से है.
तेरी हर ख़ुशी से ख़ुशी है मेरी,
और आँखों में पानी तुम से है.
मैं पल पल तड़पती हूँ तेरे लिए,
मेरी यह जिन्दगानी तुम से है.
मैं हर बात सौचती हूँ तेरे लिए ही,
मेरे जज़्बात- ऐ -रूहानी तुम से है.
मेरा नसीब है के तुम मिल गए मुझे,
यह कुदरत की मेहरबानी तुम से है.
मैं तेरे ही प्यार में पागल हूँ,
मेरी हर अदा दीवानी तुम से है.
मेरी हर सुबह तेरे नाम से होती है,
मेरी हर शाम दीवानी तुम से है.
तुम एक उम्र की बात करते हो,
मेरे तो हर जनम की कहानी तुम से है