Wednesday, November 22, 2017

तुझ संग बैर लगाया ऐसा
रहा ना मैं फिर अपने जैसा ......

अपना नाम बदल दूं या तेरा नाम छुपा लूं
या छोड़ के सारी आग मैं वैराग उठा लूं .....

ये काली रात जकड़ लूँ ये ठंडा चंदा पकड़ लूँ
दिन रात के बैरी भेद का रुख मोड़ के मैं रख दूँ .....

तुझ संग बैर लगाया ऐसा
रहा ना मैं फिर अपने जैसा ......

मेरा नाम इश्क़ तेरा नाम इश्क़

लाल_इश्क़ ......

Tuesday, November 21, 2017

मेरी हर खुशी में हो तेरी खुशी
मोहब्बत में ऐसा ज़रूरी नहीं.......
प्यार करने से पहले ऐसा कोई वादा तो नहीं लिया था तुमसे के जो मुझे अच्छा लगे वो ही तुम कहोगें या करोगें और ना ही ऐसा कोई वादा किया था मैंने के मैं हर वक़्त हर हाल में तुमको खुश रखूँगी! प्यार तो प्यार होता है उसमें कोई खुशामत नहीं होती, खूबी के साथ ऐब को भी प्यार के धागे में मोतियों की तरह सजाना होता है... अपने आप में कभी मस्त तो कभी दुःखी तो तभी भी होते है जब अकेले होते है, फिर अगर प्यार से किसीका दामन थाम भी लिया, तो फिर गम या उम्मीद की शिकायत कैसी? जुड़ने से वो इंसान, उसकी बातें, उसका रंग ढंग, उसका रवैया, उसका रहन सहन, उसकी सोच, उसके जज्बात, उसका अस्तिवत थोड़ा बदल ज़रूर जाता है लेकिन मिट तो नहीं जाता! फिर उसे अपने खुद के किरदार से निकालकर जैसा तुमकों पसंद हो वैसा बनाने के ये ज़िद कैसी?
"मोहब्ब्त है ये जी हुज़ूरी नहीं..............."

हो सकता है मेरा तरीका बदल गया हो, वक़्त के साथ सहलाने का सलीका बदल गया हो, लेकिन फितरत नहीं! क्यों किसी एक को भी ये पुरवार करने की ज़रूरत पड़े के बदले वक़्त के साथ हम नहीं बदले! हो सकता है मनाने का ढंग बदल गया हो क्योंकि मानने मनाने के ज़ोन से कबके आगे निकल चुके है लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं के चाहत बदल गई है। इश्क़ है तो इश्क़ है और रहेगा चाहें रूठ जाओ या खुद ही मान जाओ, मोहब्ब्त है कोई समझौता तो नहीं! बाकी समझाना मेरे बस की नहीं, बस इतना समझ लो के "कैसे खुश तुझे रखूं नहीं पता, पर चाहती हूं तेरे लबों पे हँसी....."

मोहब्बत है ये जी हुज़ूरी नहीं.....

-YJ

Saturday, November 11, 2017

नारी

हर मोर्चे पर लड़ती दिख जाती है वो ...

कभी भावनाओं से लड़ने का संघर्ष ...

कभी अपने हक को पाने का संघर्ष ...,

कभी ज़िन्दगी को जीने का संघर्ष ....

कभी अपनी चाहत को पाने का संघर्ष ...,

पर इच्छाशक्ति की स्वामिनी बन ...

हर मोर्चे पर परचम लहरा जाती है वो ...

फिर अंत में अपनो से ही हार जाती है वो ...,

हथियार तो तब भी नही डालती वो ....

बस रिश्ते जीवंत करते-करते छलनी हो जाती है वो ..

नारी है वो ...एक अदम्य साहस की परिभाषा है वो ....

Friday, November 10, 2017

नया कदम

लिखना फिर से शुरू करना ऐसा है जैसे कोई पिंजड़े से किसी बेबस पंछी का आज़ादी की उड़ान की तरफ पहला पंख फैलाना... आज मैं भी इतने सालो बाद फिर इस  आगंन मैं अपनी शब्दो के साथ शुरू करना चाहती हूँ।

बचपन

काग़ज़ की कश्ती थी पानी का किनारा था,

खेलने की मस्ती थी ये दिल अवारा था,

कहाँ आ गए इस समझदारी के दलदल में,

वो नादान बचपन भी कितना प्यारा था।

Sunday, November 29, 2015

एक अधूरी कहानी......





            उसकी गर्म हथेलियों की मज़बूत पकड़ में मेरी उंगलियां बर्फ सी
 ठंडी पड़ चुकी थी , जैसे जैसे रास्ता ख़त्म हो रहा था उसके हाथों की गर्मी 
ठंडे पसीने से भीगनें लगी , हाथों की मज़बूत पकड़ और मज़बूत हो गई
मै उसकी आंखो में गहरा ठहरा पानी साफ देख पा रही  थी , बहोत कुछ 
कहना था उसे जो मेरी आंखें उसकी आंखों में पढ़ रहीं था मंजिल आ चुकी 
थी दो जोड़ी पैर , उस अनचाही मंजिल पर आकर थम गये 
दोनों के रास्ते एक दूसरे को काटते हुये आगे बढ़ गये... उसके ठंडे पसीने 
से तर गर्म हाथों की मज़बूत पकड़ से मैंने अपनी ठंडी पड़ चुकी हथेलियां 
अलग कर लीं दिल में बसे एहसासों पर बर्फ जम चुकी थी मेरी नाकामी 
और उसकी बेबसी की और आंखों में ठहरा पानी हम दोनों की आंखो से 
झरने सा फूट पड़ा ...

और सब कुछ एक अधूरी कहानी में बदल गया......

Tuesday, July 14, 2015




काश तुम भी तुम्हारी यादों की तरह बन जाओ


ना वक्त देखो ना बहाना, बस चले आओ...