Wednesday, June 2, 2010

क्यों...?


समझ .....
ना सके दूरियाँ क्यूँ थी

जुबां .....
पर थे लफ्ज़ फिर मजबूरियाँ क्यूँ थी

दिलो .....
की बात अगर चाहे हकीकत होती है…….

हमारे .....
दरमियान वोह खामोशियाँ क्यूँ थी

बुने .....
थे हमने भी कुछ रेशमी धागों के खवाब…….

हमारे .....
हिस्से में वोह काली दूरियाँ क्यूँ थी

समझ .....
ना सके सरगोशियाँ हवाओं की ……

हमारे .....
हिस्से में सेहरा की आंधियां क्यूँ थी

तुमने .....
तो चाहा था की हर पल साथ रहे…….

सफ़र .....
तनहा तोह फिर वोह दूरियाँ क्यूँ थी
Palak

4 comments:

books said...

mera koi comment apko milti nahi, so i dont know this comment u will fine or not, but dil ki baat to likhuga, ye kyo? poem bahut bahut bahut jyada khubusurat hai bilkul aap ki tarah keep it up

संजय भास्कर said...

खूबसूरत जज्बात ,कुछ अलग सा ।

संजय भास्कर said...

बहुत खूबसूरत भावाभिव्यक्ति....प्रेम रस मेंपगी खूबसूरत रचना...

संजय भास्कर said...

दिल को छूने वाली प्रस्तुति