Thursday, January 8, 2009

गर ये आखे किसी की शिफारिश ना करती

गर ये आखे किसी की शिफारिश ना करती
दिलों से महोब्बत की पहचान होती
और महोब्बत इतनी आसन ना होती
गर ये आखे किसी की शिफारिश ना करती
उल्फत - ऐ - महोब्बत किसी के दीदार से ना बढती
दर्द की परिभाषा यु रोज ना बदलती
गर ये आखे किसी की शिफारिश ना करती
हुस्न और इश्क की ना कोई जंग होती
प्रेम के ढाई आखर यु प्रेम ग्रन्थ ना बनते
गर ये आखे किसी की शिफारिश ना
आजमाइश - ऐ - महोब्बत यु ना रंग लाती
With Special Thanks to My Best Friend Purvi . I Hope .... purvi u ill like bit editing in this poem..
palak


2 comments:

Anonymous said...

बेनूर सी आंखों में , ख़्वाबों की चमक दी है एहसास -ऐ - अकेलेपन को , चाहत की कसक दी है लगता है कि तेरे बिन ये साँसे , चलती भी नही हैं इस कदर मेरी ज़िन्दगी को तूने रौनक दि है

Pearl...

Purvi said...

It's amazing pal....

thanks for editing such beautiful words n lines....