Monday, December 8, 2008

ये एहसास न था


कागज़ पर फिर शब्दों की कुछ लकीरें हम खिंच दिए
वो लकीरें किसकी के लिए यादों की सरहद बन जायेगी ये एहसास न था…
महसूस किया है इक ऐसा भी रिश्ता
जो नाम से आगे निकल गया
मालूम पड़ा जब लोगो को
दुनिया ने उसको कुचल दिया
वो रिश्ता धीरे धीरे से दुनिया से ओझल होने लगा
दिल में तो मगर वो तबसे ही नासूर क जैसे पलने लगा
हमारा घाव उन्हें दर्द न दे सो घाव हम अन्दर ही दबा लिए
वो घाव ही फिर हमारे जीने की वजह बन जायेगा, ये एहसास न था…

वो घाव जो दबा क रक्खा था
हम मरहम उसका बना लिए
फिर हलके हलके मलकर उसको
चद्दर के तले हम छुपा लिए
वो मरहम धीरे धीरे से, चद्दर में ऐसे घुलने लगा
वो घाव तो अक्खिर रूझ गया, चद्दर का रंग कुछ उड़ने लगा
गौर से उसको देखा तो फिर, ख़ुद ही से हम मुकर लिए
एक घाव मिटने वाला मरहम, चद्दर पर दाग सा बन जायेगा ये एहसास न था…

दिल का बोझ हल्का करने हम कलम तोह उठा दिए
वही कलम का तेज़ रुख किसीके दिल पर कटारी बन जाएगा ये एहसास न था

2 comments:

amul said...

Hi Pal,

Bahut sundar..

this line is too good..
एक घाव मिटने वाला मरहम, चद्दर पर दाग सा बन जायेगा ये एहसास न था…

Ravi Srivastava said...

aap ki khwaahish ko salaam !!!