Thursday, August 7, 2008

कंगन....!


काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता
तो बड़े प्यार से बड़े चाऊ से बड़े मन के साथ
तुम अपनी नाज़ुक सी कलाई मैं लगाती
और फ़ुसर्सद के लम्हों मैं
तुम किसी सोच मैं डूबी हाथ से घुमाती मुज को
मैं तेरे हाथ की खुशबू से महक सा जाता
जबकभी अनजाने से चूमा करती मुझे
तेरे होंठो की नजाकत से देहेक जाता मैं
रात को जब भी नीदों के सफर पर जाती
अनजाने से हाथ का तकिया बनाया करती मुझे
मैं तेरे कानो से लग कर कई बाते कर लेता
बेफिक्री से तेरी जुल्फों को तेरे गालो को चूम लेता
मुज को बेताब सा रखता तेरी चाहत का नशा हर वक्त
मैं तेरी रूह मैं बसा रहता
ऐसे ही तेरे हाथो मैं खनकता रहता
कुछ नही तो ये बेनाम सा बंधन होता
काश मैं तेरे हसीं हाथों का कंगन होता ..

काश ये बंधन ऐसे ही होता .... पलक

6 comments:

Ravi said...

.....जबकभी अनजाने से चूमा करती मुझे
तेरे होंठो की नजाकत से देहेक जाता मैं....
nice expression

amul said...

hi Pal,

you think very Beautifully !!!!

Kinaare duur hote hote itne duur ho gaye ,
Ki paani ke chhapakon ki aawaz bhi duub gayi,
Dil main aise samhalte hai ghum,
Jaise zevar sambhalta hoi koi,
Rooth gaye naaraz ho gaye,
Baahon ke kangan aur saath pheron samet lauta diye,
Haath ke anguthi utaari wapas kar di,
Magar wo zever jo dil main rakh liye the,
Uska kya hoa…..

Anonymous said...

What else one can think when he is in LOVE. You are really a good poet... you know how to express feelings in Words. Not Everyone has this ability...

Pearl...

Atharv said...

Awesome....

no words....

Atharv

Pankti said...

as usual..

lovely words....

raaaj said...

kitne khoobsoorat hai yeh mehndi bhare haath! aur usme itne sunar kangan. kahin yeh tumhare to nahin


i m waiting somethng similar from u