उसे सोचकर उठना और उसे सोचकर सो जाना,
कितना आसान है उसका न होकर भी उसका हो जाना...!!!
मेरी तम्मनाये करे कब तक इंतजार कोई भी दुआ इसे गले क्यों नही लगती, अगर हो जाती मुरादें पल मैं पुरी .... तो मुरादें नही ख्वाहिसे कहलाती....
तुझ संग बैर लगाया ऐसा
रहा ना मैं फिर अपने जैसा ......
अपना नाम बदल दूं या तेरा नाम छुपा लूं
या छोड़ के सारी आग मैं वैराग उठा लूं .....
ये काली रात जकड़ लूँ ये ठंडा चंदा पकड़ लूँ
दिन रात के बैरी भेद का रुख मोड़ के मैं रख दूँ .....
तुझ संग बैर लगाया ऐसा
रहा ना मैं फिर अपने जैसा ......
मेरा नाम इश्क़ तेरा नाम इश्क़
लाल_इश्क़ ......
मेरी हर खुशी में हो तेरी खुशी
मोहब्बत में ऐसा ज़रूरी नहीं.......
प्यार करने से पहले ऐसा कोई वादा तो नहीं लिया था तुमसे के जो मुझे अच्छा लगे वो ही तुम कहोगें या करोगें और ना ही ऐसा कोई वादा किया था मैंने के मैं हर वक़्त हर हाल में तुमको खुश रखूँगी! प्यार तो प्यार होता है उसमें कोई खुशामत नहीं होती, खूबी के साथ ऐब को भी प्यार के धागे में मोतियों की तरह सजाना होता है... अपने आप में कभी मस्त तो कभी दुःखी तो तभी भी होते है जब अकेले होते है, फिर अगर प्यार से किसीका दामन थाम भी लिया, तो फिर गम या उम्मीद की शिकायत कैसी? जुड़ने से वो इंसान, उसकी बातें, उसका रंग ढंग, उसका रवैया, उसका रहन सहन, उसकी सोच, उसके जज्बात, उसका अस्तिवत थोड़ा बदल ज़रूर जाता है लेकिन मिट तो नहीं जाता! फिर उसे अपने खुद के किरदार से निकालकर जैसा तुमकों पसंद हो वैसा बनाने के ये ज़िद कैसी?
"मोहब्ब्त है ये जी हुज़ूरी नहीं..............."
हो सकता है मेरा तरीका बदल गया हो, वक़्त के साथ सहलाने का सलीका बदल गया हो, लेकिन फितरत नहीं! क्यों किसी एक को भी ये पुरवार करने की ज़रूरत पड़े के बदले वक़्त के साथ हम नहीं बदले! हो सकता है मनाने का ढंग बदल गया हो क्योंकि मानने मनाने के ज़ोन से कबके आगे निकल चुके है लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं के चाहत बदल गई है। इश्क़ है तो इश्क़ है और रहेगा चाहें रूठ जाओ या खुद ही मान जाओ, मोहब्ब्त है कोई समझौता तो नहीं! बाकी समझाना मेरे बस की नहीं, बस इतना समझ लो के "कैसे खुश तुझे रखूं नहीं पता, पर चाहती हूं तेरे लबों पे हँसी....."
मोहब्बत है ये जी हुज़ूरी नहीं.....
-YJ
हर मोर्चे पर लड़ती दिख जाती है वो ...
कभी भावनाओं से लड़ने का संघर्ष ...
कभी अपने हक को पाने का संघर्ष ...,
कभी ज़िन्दगी को जीने का संघर्ष ....
कभी अपनी चाहत को पाने का संघर्ष ...,
पर इच्छाशक्ति की स्वामिनी बन ...
हर मोर्चे पर परचम लहरा जाती है वो ...
फिर अंत में अपनो से ही हार जाती है वो ...,
हथियार तो तब भी नही डालती वो ....
बस रिश्ते जीवंत करते-करते छलनी हो जाती है वो ..
नारी है वो ...एक अदम्य साहस की परिभाषा है वो ....
लिखना फिर से शुरू करना ऐसा है जैसे कोई पिंजड़े से किसी बेबस पंछी का आज़ादी की उड़ान की तरफ पहला पंख फैलाना... आज मैं भी इतने सालो बाद फिर इस आगंन मैं अपनी शब्दो के साथ शुरू करना चाहती हूँ।
काग़ज़ की कश्ती थी पानी का किनारा था,
खेलने की मस्ती थी ये दिल अवारा था,
कहाँ आ गए इस समझदारी के दलदल में,
वो नादान बचपन भी कितना प्यारा था।