Wednesday, September 17, 2008

कहीं ये कोई इशारा तो नहीं !!


भीगी तो नहीं है पलकें ,
पर हाँ नम हैं आँखें आज फ़िर,
दर्द तो नहीं है दिल में कोई
पर एक एहसास सा है आज फ़िर,


उस ऊंचे आकाश को देख कर
फ़िर उड़ने को दिल क्यों करता है ?
इस फैली धरती को देख कर
इसमें समाने को दिल क्यों करता है ?


ओस की बूंदों पर ,फूलों के रंगो में
मैं कुछ ढूँढने लगी हूँ !
बारिश की रिमज़िम में ,तारों की टिमटिम में ,
मैं कुछ खोने सी लगी हूँ !


सच तो नही शायद पर फ़िर भी दिल ये पूछता है ,
ये उड़ना ये खोना ,ये आँखों का नम होना ..
कहीं ये कोई इशारा तो नहीं !!

Tuesday, September 16, 2008

उमर लग जाये उन्हें.....!!!!


प्यार का जिस ने मुझे एहसास दिलाया
जिस के कंधे ने मेरे असू पीए कही बार …
जिन बाँहों ने मुझे सहारा दिया,
दिल में जिनकी सबसे खास-अनोखी जगह है,
जिन्होंने ने मेरे जीवन को आधार दिया
हर मुशकिल राह को जिसने आसां किया ,
खुश रहें सदा वो दिल से !!
कोई गम ना हो, बस ये सौगात मांगती हूँ


ए खुदा मेरी भी उमर लग जाये उन्हें
हर वक़्त हर घडी ,आपसे उनका साथ मांगती हूँ


दिल दुखाया है मैंने , कई बार..
जानती हूँ… और सजा भी खुद आज मांगती हूँ …


मेरी आत्मा है वो न कोई उन जैसा मेरे लिए
हर जनम ,अपने साथ उनका हाथ मांगती हूँ


पलक

Sunday, September 14, 2008

~~~~यादे, बस यादे ~~~~~


कदम रुक जाते हे
कई बार पलट कर
जब हम बीते लम्हों को टटोलते हे,
यही तो तुम खड़े थे
वो कम शक्कर की चाय के कप पर
वो बरसती शाम की बूंदों पर
तुमने मुझे पास बुला कर कहा था
की "तुम्हारे बिना जिया नही जाता"
वो बूंदे गवाह थी, तुम्हारे इज़हार की
वो गवाह वक्त के साथ सूख गए
पर यादे.....
वो वही उसी कमरे में
खिड़की पर तुमसे छुट गई
चाय का कप तो धुल गया
पर उस मे जमी तुम्हारी
खुशबू मिट नही पाई...
आज भी बारिश बहुत तेज हे
खुली खिड़की की आवाज़.. लगता हे
तुम्हे बुला रही हे
कदम रुक जाते हे
कई बार पलट कर जब हम
बीते लम्हों को टटोलते हे..


palak

जब वो मेहँदी रचाए हाथों मैं ....!!!


ऐसी ही सर्द शाम थी वो भी ....
जब वो मेहँदी रचाएं हाथों मैं ....
मेरे पास वो आई थी .......
ज़मानी से बच कर ....
सब से नज़रे चुरा कर....
सुर्ख अचल मैं मुह छुपाये हुए ...
ख़त अपने मुज से लेने आई थी वो....
उस की सहमी हुई निगाहों मैं .....
कितनी खामोश सी बाते थी ......
उसके दिल मै कही अनकहे सवाल थे ..
उस के चेहरे की जर्द रंगत मैं ....
कितनी मजबूरियों के साये थे ....
मेरे हाथों से ख़त लेते हुए .....
ना जाने क्या सोच के अचानक वो .....
मुज से लिपट कर रोई थी ....
उस के गुलाबी होठों के ....
कपकपाते किनारों पर ...
कही अन कहे फसाने थे .....
सर्द शाम मैं आज भी अक्सर ....
उस की रुख्सदी का मंज़र .....
मेरी आखों मैं जिलमिलाता है .....
बस एक वही लम्हा .....
मुज को अपनी तरफ़ ....
बार बार खिचता है ....
ऐसी ही सर्द शाम थी वो भी ...
जब वो मेहँदी रचाए हाथों मैं ....
मेरे पास आई थी.......


पलक ....!!!!!

Friday, September 12, 2008

ek aur naya sapana !!


Har baar ungaliyon ko chooke;
Haath se Phisalta Sapana;
Pass aake kosoon door
Nikal jaane wala Sapana;
Ummid ki har dor
har beete din pe
kamajor banane wala sapana;
Phir bhi har naye daur me
nayi roshani deta
in aankkhon me sajata ye sapana;
jindagi ko naya roop rang deta,
jeene ke liye ek maksad deta,
phir se tootane ke liye
ubharta ek aur naya sapana !!


*****PALAK******

Thursday, September 11, 2008

निशान दिल पर तेरे ....!!!


गीली रेत पर पैरों के निशान
हाँ, मिट जायंगे,
उस सागर की इक लहर के संग
पर उन चिह्नों का क्या?
जो दिल पे छाए, बन कर घने साये ...
नही मिटते वो आसुओ के साथ भी
ओर गहरे हो जाते है ..
क्या है कोई ऐसा सागर....
जो मिटा दे ये निशान...

पलक